Sunday, May 28, 2023

करोगे याद तो हर बात याद आएगी...

करोगे याद तो हर बात याद आएगी,
गुज़रते वक्त की हर मौज़ ठहर जाएगी..

ये चाँद बीते ज़मानों का आईना होगा,
भटकते अब्र में, चेहरा कोई बना होगा,
उदास राह कोई दास्तां सुनाएगी..
करोगे याद तो..

बरसता-भीगता मौसम धुआँ-धुआँ होगा,
पिघलती शम्मों पे दिल का मेरे ग़ुमां होगा,
हथेलियों की हिना, याद कुछ दिलायेगी,
करोगे याद तो!

गली के मोड़ पे, सूना सा कोई दरवाज़ा,
तरसती आँखों से रस्ता किसी का देखेगा,
निगाह दूर तलक जा के लौट आएगी,
करोगे याद तो हर बात याद आयेगी..
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ये गीत (या ग़ज़ल , जो भी कहें) बेहद intense है और दिल के बेहद ही करीब रहा है।
अस्सी का दशक हिंदी फिल्मी गीतों के लिए कोई खास और यादगार दशक नहीं माना जाता. 60s 70s को सुमधुर बनाने वाले म्यूजिक स्टार्स  शंकर जयकिशन , मदनमोहन, SD बर्मन, पंचम, फिर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से होते हुए हिंदी गीतों को संगीतबद्ध करने की कमान 80s में बप्पी दा तक पहुँची तो लोग यहाँ तक सोचने लगे कि क्या गीतों के साथ जुड़ी संवेदना और मधुरता कभी लौटेगी?
 पर इस दौर में फूहड़ फिल्मी गीतों द्वारा पैदा किया गया शून्य ग़ज़लों को आम जनों के ज्यादा करीब ले आया। इसी दौर में प्राइवेट ग़ज़ल एलबम्स चुनिंदा संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हुए। 80s में जगजीत चित्रा ,  पंकज उधास, चंदन दास, अनुप जलोटा, ग़ुलाम अली, पीनाज मसानी , भूपिंदर मिताली, राजेंद्र & नीना मेहता, तलत अज़ीज़, कई कलाकार इस रस्ते म्यूजिक इंडस्ट्री में आए और अपने संगीत से भारतीय संगीत प्रेमियों को संगीत के साथ थामे रखा।   80s में ग़ज़लों को मिली बेहतर स्वीकार्यता ने संवेदनशील और लीक से हटकर फिल्में बनाने वाले निर्देशकों को अपनी फिल्मों में ग़ज़लों और नज़्मों के इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया।

अस्सी के दशक की शुरुआत में तीन ऐसी फिल्में आयीं जो फिल्मी ग़ज़लों की सफलता के लिए मील का पत्थर साबित हुई। ये फिल्में थी अर्थ, बाजार और उमराव जान। उस ज़माने में शायद ही कोई संगीत प्रेमी होगा जिसके पास इन तीनों फिल्मों के कैसेट्स ना रहे हों। जहाँ अर्थ का संगीत ख़ुद ग़ज़ल सम्राट कहे जाने वाले जगजीत सिंह ने दिया था वहीं उमराव जान और बाजार के संगीतकार ख़य्याम थे। खय्याम अपनी  claasical music की गहरी जानकारी एवं संगीत के perfection के सनक एवं जुनून के लिए जाने जाते थे।  सागर सरहदी और उनकी फ़िल्म बाजार से जुड़े हुए  कई किस्से हैं जो आप लोगों ने पढ़े ही होंगे। आज इसके एक गाने करोगे याद तो..पर बात करते हैं।

ख़य्याम साहब ने इन फिल्मों में बेहद  नामचीन शायरों जैसे मीर तकी मीर, मिर्जा शौक़, शहरयार और मखदूम मोहिउद्दीन की शायरी का इस्तेमाल किया। पर उनकी इस फेरहिस्त में एक अपेक्षाकृत गुमनाम शायर का नाम और भी था। जानते हैं कौन थे वो ? ये शायर थे बशरत नवाज़ खान जिन्हें दुनिया बशर नवाज़ के नाम से जानती थी। 
सन 1935 में औरंगाबाद, महाराष्ट्र में जन्मे थे। बशर नवाज़ अपने समकालीनों की तरह युवावस्था में वामपंथी विचारधारा (जो कि वर्ग रहित समाज की परिकल्पना पर आधारित थी) से प्रभावित रहे।  कविता के अलावा समालोचना, नाट्य लेखन जैसी विधाओं में भी उन्होंने हाथ आज़माया। दूरदर्शन के धारावाहिक अमीर खुसरो के लिए पटकथा लिखी और 'बाजार' के अलावा 'लोरी ' और 'जाने वफ़ा' जैसी फिल्मों के लिए गीत भी लिखे। पर हिंदी फिल्म संगीत में वो अपनी भागीदारी को बाजार फिल्म के गीत करोगे याद तो हर बात याद आयेगी ...से हमारे हृदय में हमेशा हमेशा के लिए अंकित कर गए। 

गीत के भाव :
ये तो हम सभी जानते हैं कि ज़िंदगी की पटकथा को तो ऊपर वाला रचता है, यानी जीवन अनिश्चितता लिए हुए होता है। जाने कब कैसे किसी से मिलाता है। साथ बिताए पलों की खुशबू से दिल में अरमान जगने ही लगते हैं कि एक ही झटके में अलग भी कर देता है ।  फिर इंसान को छोड़ देता है अकेला अपने आप से, अपने वज़ूद से जूझने के लिए। साथ होती हैं तो बस यादें जो उन गुजरे लमहों की कसक को रह रह कर ताज़ा करती रहती हैं।

फिल्म के किरदारों के बीच की कुछ ऐसी ही परिस्थितियों को नवाज़ साहब ने चाँद, बादल, बरसात और दीपक जैसे बिंबों में अदभुत और खूबसूरत  ढंग से लिखा है, और फिर इसे खय्याम एवं भूपिंदर ने अपने संगीत एवं आवाज़ से  कर्णप्रिय अभिव्यक्ति दी है, गीत में चार चांद लगा दिये हैं । गीत में शीशे की तरह चमकते चाँद के बीच भटकते बादलों में बनते चेहरे की उनकी सोच हो या फिर जल जल कर पिघलती शम्मा से वियोग में डूबे दिल की तुलना..भूपेंद्र (भूपिंदर सिंह) की आवाज़ में इन लफ्जों को सुन करके मन उदास, फिर और उदास होता चला जाता है.. 
80 वर्ष की उम्र में जुलाई 2015 में गीतकार बशर नवाज़ का औरंगाबाद महाराष्ट्र में निधन हो गया। किन्तु इस गीत से वो हिंदी फिल्मी गीत पसंद करने वालों के दिलों में अपनी खास छाप छोड़ गए। 
आज न तो उनकी जन्मतिथि है और न ही पुण्यतिथि पर ये गाना सुना, और लेखक को याद किया..
करोगे याद तो हर बात याद आएगी..जब भी ये गीत सुना, दिल एक अलग ही Nostalgia में डूब गया..आप भी सुनिए..

Monday, April 17, 2023

पहला नशा पहला खुमार..

पहला नशा पहला खुमार...नया प्यार है नया इंतज़ार...1993 की फ़िल्म जो जीता वही सिकंदर का ये कर्णप्रिय प्रेम गीत दिल और भावनाओं के बेहद करीब है और सदा ही all time favourite रहा है। पिछले कई सालों से cassettes, CDs, PC, LAPTOP, Tabs , MEMORY CARDs में ये गीत सदा साथ रहा है, उस दौर में भी जब 2GB MEMORY भी LUXURY थी तब 15MB का ये गीत साथ रहा है। 


90s के गीतों में संगीत ज्यादा था और शोर कम। 90s के गीतों मे मासूमियत, गंभीरता , संजीदगी , सादगी , कम में भी बहुत , असंतृप्ति का पता होकर भी संतृप्ति, content  था सबकुछ.. 

गीतों के पिक्चराइजेशन में , अभिनेताओं के हाव भाव तथा अभिव्यक्ति में ये सब महसूस किया जा सकता है। 
उस दौर को रिप्रेजेंट करता हुआ सा , स्कूल की किशोर उम्र में प्रेम को दिखाने बताने वाला ये गीत है।  फ़िल्म " जो जीता वही सिकंदर" फ़िल्म का ये गीत "पहला नशा पहला खुमार" से बेहतर शायद कुछ दूसरा नही हो सकता है , ये गीत एक धीमा जहर और खुमारी से भरा हुआ है। इस गीत के रिलीज होने, फ़िल्म के आने के समय ये कोई सुपरहिट नहीं था, धीरे धीरे ही ये लोगो के करीब आता गया,  और धीमे से एक cult बन गया , और शायद अब भी इसका खुमार चढ़ रहा है एवं अब भी बाकी है..
मैं 90s के दौर में बड़ा हुआ हूँ, इसलिए उस दौर से उस जमाने की चीजों से व्यक्तिगत लगाव है, शायद बहुत से लोगों को भी होगा। उस दौर को याद करता हूँ तो लगता है कि उस दौर की हर चीज में  एक ठहराव था,  एक खूबसूरत सा ठहराव, एक slow motion जैसा ठहराव.., ये ठहराव उस दौर के प्रेम के हर रूप में भी था, क्योंकि तब न तो break up शब्द से उस दौर के युवाओं का परिचय था, न ही अभी के instant दौर जैसी क्षण भंगुरता थी। ये ठहराव उस दौर के फिल्मी गीतों के स्लो टेम्पो में भी था , तब शब्दों में समाए भावों को उसकी धुन एवं संगीत से गहरी अभिव्यक्ति  होती थी...
...मिथुन दादा और बप्पी लहरी के संगम से कोई क्या ही उम्मीद करेगा? तो इनके संगम से एक तरफ  गीत बना कि- चढ़ गया ऊपर रे,  गुटूर गुटूर ..पर वहीं उसी फ़िल्म से याद रह जाने वाला  एक ये गीत भी निकला कि-" ठहरे हुए पानी में कंकर न मार ..।

 वाद्य यंत्र संगीत भी पैदा करते हैं और शोर भी, मगर शोर और संगीत में एक फर्क होता है जो महसूस करने की चीज है...
आज जिस आसानी से मोबाइल एवं इंटरनेट के माध्यम से  लोग अभिव्यक्त कर पाते हैं, कनेक्ट हो पाते हैं , तब ऐसी आसानी नहीं थी। फ़िल्म में हीरो के बड़े भाई का रोल करने वाले मामिक जिस तरह से ग्रोसरी बैग में प्रेमपत्र रखता है , वैसी धर्मसंकट और बड़ी परेशानी को इस मोबाइल के दौर वाली पीढ़ी कभी समझ ही नहीं सकेगी। कुछ सालों बाद आये टेलीकॉम ऑपरेटर एयरटेल का punch line ही था- "Express Yourself " .  Telecom एवं internet  ने सचमुच काफी कुछ बदल दिया.

  experts का मानना है कि internet के बाद दुनिया बदल देने वाला कोई बड़ा आविष्कार अब तक नहीं हुआ है तथा 25-30 बरस से युगपरिवर्तन करने वाले आविष्कार की जगह खाली है।

  उल्लास एवं उत्सव तथा शोक एवं ग़म, दोनो ही ज़िन्दगी के विरोधाभासी भाव हैं और पहलू भी हैं। दोनो का अपना मजा है और सज़ा भी है। बुद्धिमानी दोनो भावों का आनंद लेने में है। एक दूसरे के contrast से दोनो निखरते हैं। जीवन के अच्छे बुरे मध्यम सभी रंगों को समग्रता से लेना ही बेहतर एवं बुद्धिमानी है।
 
स्लो मोशन में फिल्माए गए इस गीत के  बाद हिंदी फिल्मी गीतों में स्लो मोशन में फिल्माने का एक दौर चल पड़ा था, जो कि 1942 A love story के गीत इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा से और भी बढ़ा..आज तक चला ही आ रहा है। अब तो मोबाइल के कैमेरास में भी slo mo का feature होता है और इसके बहुत प्रयोग होते हैं।
 

40+ की उम्र वाले तो उस दौर का व्यक्तिगत अनुभव होने की वजह से  90s की फिल्मों और गीतों से जुड़ाव महसूस करते हैं , पर कई बार आश्चर्य होता है कि 20-30 वर्षीय लोग भी 90s के गीत संगीत और फिल्मों का आनंद ले रहे होते हैं। 
90s के एलबम्स, सैटेलाइट टीवी चैनल्स एवं टॉकीजों के दौर से आज के multiscreen, मोबाइल यूट्यूब OTT के दौर तक गीतों फ़िल्मों और आम जीवन मे बहुत ज्यादा बदलाव हुए हैं, कभी कभी तुलना करने पर ये समझ नहीं आता कि क्या कहें, वो दौर अच्छा था या कि ये...
खैर जो कुछ भी हो , ये गीत पहला नशा, पहला खुमार... सदा से मासूम प्यार की अभिव्यक्ति रहा है..दिल, याद, भावनाओं के बेहद ही करीब... ये रही लिंक..सुनिए , सुनाइये..

Monday, April 3, 2023

Iditot & intelligent (मूर्ख एवं बुद्धिमान)

लोग अक्सर पूछते हैं कि मैं अपने परिचय में खुद को इडियट क्यों लिखता हूं? 
तो साथियों यह कोई आज का मामला नहीं है... तकरीबन तीन दशक से खुद को इडियट ही लिखता रहा हूं... सुपर इडियट. अंतर अब यह आ गया है कि इडियट के साथ फिलॉसफर शब्द जुड़ गया है. अपनी चंद कहानियों में, जहां मैं खुद को किसी कैरेक्टर में पाता था, इडियट कहलवा देता था.

इडियट वाली इस बात पर एक सुधी मित्र ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है:
"धारा के विपरीत सोचना, कहना काफी हिम्मत और साहस का काम है. अक्सर नए विचारों को इडियोटिक की श्रेणी में डालकर इसका उपहास उड़ाया जाता रहा है और लोगों को इडियट कह दिया जाता रहा है. कोई भी दौर इडियट्स का रहा नहीं. लोगों से इडियट्स को समझने में हमेशा देर हुई है और समय के साथ इडियट ही बुद्धिमान साबित हुए और बाकी लोग इडियट साबित हुए. इडियट बनना, होना, जीना बेहद दुश्कर तो है ही साथ ही रोचक भी है."
दिलचस्प तो ये है कि यूनान, जहां इडियट शब्द की उत्पत्ति हुई, वहां आज भी इडियट का नकारात्मक अर्थ नहीं है. इडियट सिर्फ अंग्रेजी भाषा में नकारात्मक शब्द है. प्राचीन यूनान में हर राजनेता का सार्वजनिक मामलों में अपना कोई न कोई मत और विचार होता था. जिन लोगों का अपना कोई मत नहीं होता था या जो अपना मत व्यक्त नहीं करते थे, वह चुपचाप रहते थे. तब ऐसे लोगों को इडियट कहा जाता था.
वैसे वो सुधी मित्र मैं ही हूँ.....😊

Idiot या intelligent जैसे सामान्यीकरण(generalization) और वर्गीकरण सदियों से किये जाते रहे हैं और किये जा रहे हैं, किन्तु हर सामान्यीकरण को specific ढंग और दृष्टिकोणों से देखा जाना भी ज़रूरी है।
“All generalizations are dangerous, even this one.”  ― Alexandre Dumas-fils

"सभी चीजों का सामान्यीकरण करना खतरनाक है, यहाँ तक कि यह भी।" --- एलेक्जेंडर डुमास-फिल्स
[ अलेक्जेंड्रे डुमास फिल्स alɛksɑ̃dʁ dymɑ fis (1824 -1895) एक फ्रांसीसी लेखक और नाटककार थे, जिन्हें 1848 में प्रकाशित रोमांटिक उपन्यास ला डेम ऑक्स कैमेलियास (द लेडी ऑफ द कैमेलियास) के लिए जाना जाता है, इस उपन्यास को उसके  नाटक प्रस्तुति कैमिली के नाम से अधिक जाना जाता था।
इनके पिता एक प्रसिद्ध नाटककार द थ्री मस्किटियर जैसे क्लासिक कार्यों के लेखक भी थे।  इनका जन्म उनकी माँ मैरी-लॉर-कैथरीन लैबे एक ड्रेसमेकर महिला और एक कुलीन उपन्यासकार एलेक्जेंडर डुमास (पिता) की नाजायज संतान के रूप में हुआ था। अपने लगभग सभी लेखों में इन्होंने साहित्य के नैतिक उद्देश्य पर बेहद बल दिया था; ये अपने जीवनकाल में न केवल अपने पिता से अधिक प्रसिद्ध थे, बल्कि 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गंभीर फ्रांसीसी मंच पर भी हावी रहे।
उनके बेटे थॉमस-एलेक्जेंडर डुमास क्रांतिकारी फ्रांस के एक उच्च पदस्थ जनरल बने। ]

'General solution & specific Solution' ये शब्द higher mathematics पढ़े हुए छात्रों को शायद याद होगा कि limit वाले integration और funtuction में ये टर्म आता है और बहुत से प्रश्नों के अंत में ये आता है। Maths में इसका मतलब ही यही होता है कि उस खास equation को general एवं extremely specific aspect में देखा जाता है कि इस particular equation की परिणति क्या होगी।
यही सिद्धांत MicroProcessor chips के VLSI designing एवं high technologies जैसे कि AI & ChatGPT आदि के आधार में से एक है। 

गौर करेंगे तो अपने आस पास समाज में इस generalization & specification के प्रभावों और परिणामों को भी महसूस किया जा सकता है।
मुद्दे की बात ये है कि - किसी को idiot या intelligent का तमगा देना या ऐसा सामान्यीकरण एवं वर्गीकरण खतरनाक हो सकता है। भिन्न भिन्न दृष्टिकोण से एक ही चीज भिन्न भिन्न दिखाई देती है।