Tuesday, December 21, 2021

नहीं रखता दिल में कुछ छुपा के...


नहीं रखता दिल में कुछ- Nahin Rakhta Dil Mein (Lucky Ali)

नहीं रखता दिल में कुछ रखता हूँ जुबां पर,
समझे ना अपने भी कभी,
कह नहीं सकता मैं क्या सहता हूँ छुपा कर, इक ऐसी आदत है मेरी...
90s का गाना है, मेरा पसंदीदा, lyrics यानी बोल बहुत गहरे अर्थ लिए हुए हैं और ultimate philosophy शानदार है। उस जमाने में एक cult था लकी अली का, उनके गानों में  एक प्रकार के modern ग़ज़ल का टच होता था, और सुनने वाले को लंबे समय तक प्रभावित करके रखती थी। लकी अली के बहुत सारे गाने बेहतरीन हैं, ये उनमे से एक है , वीडियो भी एक अलग और अच्छी स्टोरी दिखाती है और अच्छा compliment करती है। कुल मिलाकर कर्णप्रिय और melody मिलेगी आपको यदि सार्थक हिंदी संगीत पसंद करते हैं तो..तो फिर 
सुनियेगा ज़रूर !!!

Lyrics कुछ यूँ है: 

नहीं रखता दिल में कुछ रखता हूँ जुबां पर,
समझे ना अपने भी कभी,
कह नहीं सकता मैं क्या सहता हूँ छुपा कर, इक ऐसी आदत है मेरी..
सभी तो हैं जिनसे मिलता हूँ,
सही जो है इनसे कहता हूँ..
जो समझता हूँ..

मैंने देखा नहीं रंग दिल आया है सिर्फ अदा पर,
इक ऐसी चाहत है मेरी,
बहारों के घेरे से लाया मैं दिल सजा कर,
इक ऐसी सोहबत है मेरी,
साये में छाए रहता हूँ,
आँखें बिछाये रहता हूँ,
जिनसे मिलता हूँ,

कितनो को देखा है हमने यहाँ,
कुछ सिखा है हमने उनसे नया..

पहले फुरसत थी अब हसरतें समाकर,
इक ऐसी उलझन है मेरी,
खुद चलकर रुकता हूँ जहाँ जिस जगह पर,
इक ऐसी सरहद है मेरी,
कहने से भी मैं डरता हूँ,
अपनों के धुन में रहता हूँ,
कर क्या सकता हूँ!

दे सकता हूँ मैं थोडा प्यार यहाँ पर,
जितनी हैसियत है मेरी,
रह जाऊं सबके दिल में दिल को बसाकर,
इक ऐसी नियत है मेरी,
हो जाये तो भी राज़ी हूँ,
खो जाऊं तो मैं बाकी हूँ,
यूँ समझता हूँ,

रस्ते न बदले न बदला जहां ,
फिर क्यों बदलते कदम हैं यहाँ..

Album: सिफर (1998)
Music By: लकी अली
Lyrics By: स्येद असलम नूर
Performed By: लकी अली
Labels: 1990s , 1998 , Lucky Ali , Sifar , Syed Aslam Noor



Thursday, March 11, 2021

कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है..

कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है,
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है...

हमसे पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी,
हमने भी इस शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है..

उससे बिछड़े बरसों बीते लेकिन आज न जाने क्यों,
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारण धमकाया है..

कोई मिला तो हाथ मिलाया; कहीं गए तो बातें की,
घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है...

-निदा फ़ाज़ली की लिखी और जगजीत सिंह की एक खूबसूरत ग़ज़ल Album: Visions (पर मैंने "रिश्तों में दरार आई" कैसेट में सुना है) , ये लाइनें आज एक मित्र ने भेजा और बहुत अच्छा लगा , काफी सुना है इस ग़ज़ल को कैस्सेट्स के ज़माने में, वो दौर अलग था, दुनिया भी अलग थी, 10-12 गाने होते थे एक cassette में और इतना सुनते थे की lyrics, tune और sequence भी याद हो जाता था...ये ग़ज़ल बहुत सरल और अर्थपूर्ण लगती थी और आज भी लगती है, और सोंचे तो हर कोई समझ और correlate कर सकता है....किसी को ग़ज़ल पसंद हो मगर ये नहीं सुन पाये हो तो ज़रूर सुनें आशा है आपको ज़रूर पसंद आयेगा...

एक तस्वीर यूँ ही..

एक और यूँ ही...
ज़िन्दगी भी अक्सर गुज़र रही है यूूँ ही..